CG Blog

Monday, June 21, 2010

REPORTER: father's day

REPORTER: father's day

gas kand

एंडरसन तो भोपाल में 15 हजार हत्याएँ करके 25 वर्ष पहले ही भाग गया। लोग बेवजह ही आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। हर कोई अपने को बचाना चाहता है। हर कोई दूसरे को दागदार बनाना चाहता है। बचाने और बनाने के इस खेल में कोई यह सोचने को तैयार ही नहीं है कि आखिर एंडरसन को किसने भगाया? साफ जवाब है कि एंडरसन को देश की लिजलिजी व्यवस्था ने भगाया। उस व्यवस्था में सरकार किसी की भी होती, वही होता, जो व्यवस्था में है। कांग्रेस सरकार के समय एंडरसन भागा, तो भाजपा शासन में भी कट्टर आतंकवादी अजहर मसूद को छोड़ा गया। सभी यही कहेंगे कि नियम कायदे हालात तय करते हैं। उस समय जो हालात थे, उसके तहत एंडरसन को भगाना जरुरी था। उधर कांधार कांड के समय के हालात ऐसे थे कि अजहर मसूद को छोड़ना पड़ा। दोनोंे पार्टियों के अपने-अपने तर्क हैं। अपने-अपने आसमां हैं।मामला एंडरसन का हो या फिर अजहर मसूद का। ऐसे वक्त पर सरकारें हमेशा निरीह ही हो जाती हैं। निरीह होना लाजिमी भी है, क्योंकि सभी सरकारों के स्वार्थ उससे जुड़े होते हैं। स्वार्थ लिप्सा में क्या-क्या नहीं हो जाता। एक भारतीय राजनयिक अपना धर्म बदलकर दूसरे देश के लिए काम करना शुरू कर देती है। सरकार को इसका पता बहुत बाद में चलता है। यह सब एक व्यवस्था के तहत होता है। इसी व्यवस्था में ही छिपा है अव्यवस्था का रहस्य। वास्तव में देखा जाए, तो अव्यवस्था इतनी अधिक व्यवस्थित है कि वह व्यवस्था को भी सरे आम सवालों के घेरे में खड़ा कर सकती है। एक व्यवस्था के तहत सरकार तैयार करती है, उसके लिए धन की व्यवस्था करती है, फिर वह एक अव्यवस्था के तहत वह धन उन सारे हाथों तक पहुँच जाता है, जो इस अव्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मुम्बई में टिफिन सही व्यक्ति तक पहुँचाना एक व्यवस्था है और सरकार का तमाम योजनाओं पर खर्च करने के बाद भी योजनाओं का पूरा न होना एक अव्यवस्था है। इसे कोई नहीं बदल सकता। क्योंकि सरकार पूरी तरह से निर्भर है, उन लोगों पर, जो अव्यवस्था की धुरी पर हैं।अब सरकार ने एक बार फिर भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े लोगों के लिए राहत का पैकेज जारी कर दिया है। जो भोपाल में रहते हैं, वे इसे अच्छी तरह से समझते हैं कि भोपाल गैसर राहत के धन ने कितने परिवारों को बरबाद कर दिया। देखते ही देखते भोपाल महँगे शहरों में शुमार हो गया। 25 बरस बाद भी आज तक कई गैस पीड़ित ऐसे हैं, जिन्हें मुआवजे के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। इसके अलावा हजारों लोग ऐसे भी हैं, जो उस दिन शहर में थे ही नहीं, लेकिन उन्होंने मुआवजा प्राप्त किया। उनके बच्चों के नाम से मुआवजा प्राप्त किया। गैस कांड के बाद शहर में अपराध बढ़े, शराबखोरी बढ़ी, अनाप-शनाप खर्च करने वालों में वृद्धि हुई। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि मुआवजे की 80 प्रतिशत राशि बेकार गई। लोग उसका सदुपयोग नहीं कर पाए। यह सब एक अव्यवस्था के तहत ही हुआ।सोमवार यानी 21 जून को मंत्रियों का दल किसे दोषी ठहराता है, किसे राजी करता है, यह देखना है। पर सबसे बड़ी बात यही है कि ये दल राजीव गांधीन को बचाने के लिए पूरी कोशिश करेगा। उन्हें दागदार नहीं बनने देगा। बाकी ठीकरा किसी पर भी फूटे। इस मामले में अजरुन सिंह की खामोशी पर सबकी निगाहें हैं। वे कुछ नहीं बोलेंगे। क्योंकि वे एक व्यवस्था से बँधे हैं। उनकी चुप्पी ही उनके लिए जीवनदान की तरह है। ये दल प्रधानमंत्री को अपनी रिपोर्ट देगा। इस रिपोर्ट में क्या-क्या होगा और क्या-क्या नहीं होगा, इसे सब जानते हैं। यह रिपोर्ट एक लीपापोती से अधिक कुछ नहीं होगी। रिपोर्ट में इसका जिक्र अवश्य होगा कि एंडरसन को किस तरह से भारत वापस लाया जाए। लेकिन यह भी तय है कि उसे वापस लाया जाना संभव नहीं है। उसकी जान एक बार बच गई है, अब वह मुआवजा राशि देकर बचना चाहेगा।इस रिपोर्ट में यदि मंत्री प्रजा की परेशानियों को समझने की कोशिश करते दिखाई देंगे, तो इससे लाखों गैस पीड़ितों की आत्मा उन्हें धन्यवाद करेगी। लेकिन ऐसा होना संभव नहीं है, क्योंकि आम आदमी की तकलीफों को समझना वह भी बिना चुनाव के पहले, यह तो हमारे देश के नेताओं की फितरत में ही शामिल नहीं है। पिछले 60 साल में नहीं समझा, अब क्या खाक समझेंगे? मूर्खतापूर्ण बयान इन दिनों सामने आए हैं। एंडरसन को यदि नहीं भगाया जाता, तो भीड़ उन्हें मार डालती। भीड़ को उस वक्त अपनी जान बचानी थी। वह क्या किसी की जान लेती। फिर उसके सामने इतने सारे नेता थे, पुलिस थी, भीड़ ने तो किसी को नहीं मारा। जिसे अपनी जान की फिक्र होती है, वह वार नहीं करता, अपने आप को बचाता है। सरकार विमान में बैठने के बाद एंडरसन ने ऐसे ही नहीं कहा था कि ‘वेरी गुड गवर्नमेंट’। एक अव्यवस्था के तहत वह भागा, एक अव्यवस्था के तहत वह आज भी बचा हुआ है। सब कुछ व्यवस्था के तहत हो रहा है। इस व्यवस्था को ही बदलना चाहिए। हमारे नेता इसे कभी बदल नहीं सकते, क्योंकि वे भी उसी अव्यवस्था के एक अंग हैं। जब तक हमारे देश में आम आदमी का प्रतिनिधि वीआईपी होता रहेगा, तब तक इस व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। यह तय है।डॉ. महेश परिमल

Sunday, June 20, 2010

father's day


पापा आज तो फादर्स डे

अनिल चौधरी

पापा आज तो फादर्स डे है। लाखों बेटियां अपने माता-पिता की गोद में इठला रही होंगी। उनकी तमाम मांगे कम से कम आज तो पूरी की जा रही होंगी। और मैं... मैं क्या बताऊं? जब मैं ट्रेन में अकेली थी, तब से मेरा नाम और पहचान खो गई। अब मुझे मेरे नाम से कोई नहीं पुकारता। पापा, भला हो उस सफाई वाली आंटी को जिसने मुझे पुलिस अंकल तक पहुंचाया। मुझे याद है, अमरकंटक एक्सप्रेस की बोगी नंबर एस-3 का बर्थ नंबर 67, जहां मैं यह सोच रही थी कि कोई अपना आएगा और मुझे ले जाएगा। लेकिन । . .कहानी कुछ और ही बन बैठी?
उस वक्त मैं काफी डरी सहमी भी थी। पापा यह सच है न दरिन्दों और हबसियों की आंखों में उम्र, मासूमियत और अपरिपक्वता नापने का कोई पैमाना नहीं होता है। हां पापा मैंने अपनी अब तक की उम्र में ऐसा कई बार सुना है। फिर यह बताओ न कि रेलवे स्टेशन पर किस तरह के लोग नहीं होते हैं। सुना है आदमी की खल में आदमखोर भी रहा करते हैं, हाँ संवेदनाओं के आदमखोर पथरीले ढांचे तो मैंने भी देखे हैं, बस उस दिन मेरी लज्जा तो बच गई, लेकिन मैं जिस प्रक्रिया से चैरिटी होम तक पहुंची उसमें भी भटकाव था। अरे पापा! मुझे भोपाल की मातृछाया, एसओएस बालग्राम और कुछ और गैस सरकारी संस्थाओं ने लेने से इनकार कर दिया। मैं विक्षिप्त और विकलांग हूं न इसलिए। अच्छा पापा सच बताओ, मुझे इसीलिए टे्रन में छोड़ा था न?

पापा मैं भोपाल में मदर टेरेसा चैरिटी होम में हूं। मां से कहना बहुत कमजोर हो गई हूं। जब से अलग हुई, तब से कुछ खा नहीं रही हूं न। कभी-कभार दूध पी लेती हूं। लेकिन इससे सेहत नहीं बनती। कल मुझे बुखार था, मै kamjor हो गई हूँ न.... पापा अब तो पसलियाँ चमड़ी से झांकने लगी हैं, लगता है जैसे चमड़ी से बहार आने के लिए जोर आजमा रहीं हों, सेहत के लिए तो आप लोगों का प्यार, स्पर्श भी जरूरी है न। पापा मुझे यहां आने तक कई जगह लज्जा आई। अरे हां, बच्चों के लिए काम करने का दंभ भरने वाली चाइल्ड लाइन ने भी मुझे नकार दिया। सभी ने बचकाना तर्क देकर किनारा किया है। फिर भी एक अखबार के जरिये मेरी आवाज बाल अधिकार संरक्षण आयोग तक पहुंची। पता है पापा आयोग ने संज्ञान लिया और मुझे देखने फादर्स डे के ठीक एक दिन पहले चैरिटी होम पहुंचा। मुझे बहुत खुशी हुई।

पापा किसी को लज्जा आए न आए मैं तो लजा गई। अरे मुझे रविवार को भी बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया जा सकता था, लेकिन चाइल्ड लाइन ने ऐसी सलाह जीआरपी वाले अंकल को नहीं दी। भला हो पुलिस अंकल का उन्होंने अस्पताल में जांच तो कराई। फिर एक बार बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष ने भी यही कहा कि कल रविवार था, समिति तो सोमवार और गुरुवार को बैठती है। कैसे पेश करते? अरे पापा उन्हें समझाना पड़ा कि यह समिति तो 24 घंटे कार्य करने के लिए बाध्य है। तब उन अंकल ने स्वीकार किया।
पापा चाइल्ड लाइन ने कहा कि हम तीन साल से कम के बच्चों को नहीं लेते हैं। जबकि ऐसी कोई गाइड लाइन ही नहीं है। फिर मुझे क्यों छोड़ा। कारण शायद आपके छोडऩे का भी यही था कि मैं विक्षिप्त और . . . हूं। और यह भी कहा कि मातृछाया और एसओएस बालग्राम चाइल्ड लाइन से बच्चे नहीं लेते हैं। पापा यह तो सरासर झूठ था। वो तो कहीं से भी आए बच्चे लेते हैं। मैं तो इस झूठ पर लज्जा के मारे भी कुछ नहीं बोल सकी। पापा अब न वो आयोग ने संज्ञान लिया, मुझ तक चलकर आया। पापा तुम भी आ जाओ न. .. .

Saturday, June 19, 2010

father's day

फादर्स डे और वृद्वाश्रम
मनोज कुमार

आज अंग्रेजी का फादर्स डे है। हिन्दी में इसे क्या कहेंगे, मुझे नहीं मालूम। हिन्दी में यदि इसे पिता का दिन कहा गया तो इसका अर्थ ही बदल जाएगा। हिन्दी में पिता का दिन अर्थात दिवंगत पिता के लिये श्राद्ध के समय जो दिन तय होता है, उसे कहते हैं किन्तु अंग्रेजी में इसका अर्थ एकदम भिन्न है। अंग्रेजी का हर शब्द बाजार से जुड़ा होता है। पिता ही क्यों, माता, भाई, बहिन और ऐसे अनेक रिश्तों को लेकर अलग अलग दिन बना दिये गये हैं। पूरी दुनिया इस तय दिन पर जश्न मनाती है किन्तु क्या कभी किसी ने सवाल किया कि आखिर इन दिनों की निश्चितता के पीछे तथ्य और तर्क क्या है? संभव है मेरे जैसे कुछ अज्ञानी ऐसे सवाल कर रहे होंगे और उन्हें भी मेरी तरह खारिज कर दिया जाएगा क्योंकि यह सवाल उन्हें चुभते नहीं हैं, उनके सामान्य ज्ञान पर भी अंगुली नहीं उठाते हैं बल्कि ऐसे सवाल करने वाले बाजार को प्रभावित करते हैं। फार्दस डे के इस बाजारीदिवस पर कुछ अनुभव बांटना चाहता हूं, शायद यह कुछ सोचने के लिये आपको मजबूर करे। यह कितनी शर्मनाक बात है कि फादर्स डे मनाने में हम बेहिसाब खर्च कर देते हैं किन्तु बूढ़े बाप को घर से निकालने में एक मिनट से ज्यादा खर्च नहीं करते हैं। उन्हें वृद्वाश्रम में भेजकर हम अपने आपको मुक्त कर लेेते हैं। जिन बेटों ने अपने पिता को वृद्वाश्रम भेजा है, क्या वे आज फादर्स डे पर आत्ममंथन करेंगे।
आज फादर्स डे है। पिता के लिये महंगे उपहार खरीदे जाएंगे किन्तु जेब तो पिता की ही कटेगी। पिता का खुश होना, खुश होना न होकर मजबूरी होगी क्योंकि उनके दुखी होने से बच्चों के चेहरे मुरझा जाएंगे। एक पिता की खुशी अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट देख कर होती है। अब एक सवाल उन बच्चों से जो आज अपने अपने पिता के लिये फादर्स डे सेलिब्रेट करने जा रहे हैं, क्या उन्हें अपने दादाजी का नाम मालूम है? क्या उन्हें अपनी दादी का नाम मालूम है? क्या उन्हें पता है कि उनके पड़दादा या पड़दादी का नाम क्या था? क्या वे परिवार के उन बुर्जुगों का नाम भी जानते हैं, जो उनके पितातुल्य हैं? शायद कुछ लोग जानते हांेंगे और मेरा विश्वास है कि अधिकांश का जवाब ना में होगा। जो बच्चा अपने परिवार के बारे में नहीं जानता है, जो बच्चा अपने पिता के जनक को नहीं जानता है, उसके बच्चे उनके लिये तो सेलिब्रेट कर रहे होंगे लेकिन उनके बच्चे क्या आपके लिये सेलिब्रेट करेंगे? जिन्हें अपने दादा का नाम नहीे मालूम, उनके बच्चे क्या करेंगे अपने दादा का नाम जानकर। बाजार भी यही कहता है कि आज और बल्कि अभी को जानो, खरीदो, खाओ और मौज करो।
फादर्स डे के लिये मीडिया की भी विशेष तैयारी होती है। आखिर इनमें उनका भी आर्थिक हित जुड़ा है। कंपनियां अपने अपने प्रोडक्ट का विज्ञापन देंगी और मीडिया फादर के प्रति लव जाहिर करने के लिये अलग अलग किस्म के विज्ञापन जारी करेगी। यही नहीं, अपने फादर के लिये अच्छे मैसेज देने वाले को पुरस्कार भी देगी। मोबाइल फोन या इसी तरह की चीज, भले ही इसके लिये वह ऐसे अनेक बच्चों से लाखों रूप्ये टुकड़ों में वसूल ले। लगभग एक सप्ताह से फादर्स डे पर विशेष सामग्री देने का ऐलान अखबार और पत्रिका कर रहे हैं। टेलीविजन भी फादर की ब्रांडिंग में लग गयी है क्योंकि फादर पिता नहीं, ब्रांंड है जिसकी डिमांड साल में एक दिन होती है। अच्छा लगता है कि जिन माता पिता को हम साल के तीन सौ पैंसठ दिन स्मरण करते हैं। सुबह सवेरे उनका आशीर्वाद प्राप्त कर जीवन में सफलता की कामना करते हैं और मन में कहीं यह रहता है कि हम भी अपने पिता की तरह बन सकें। अब हम बाजार में खड़े हैं। बाजार में मां भी है और पिता भी। उनका आशीर्वाद भी नेट और मोबाइल से मिल रहा है। स्वाभाविक है कि समय नया है तो आशीर्वाद देने का तरीका भी नया ही होगा। बढ़ती आपाधापी और वक्त की कमी ने इसे मान लिया है। यह बहुत ज्यादा असहज नहीं करता है।
बदलाव की इस बयार में बह रहे समाज को रोकना तो मुश्किल काम है। स्वयं को रोक सकें, यही हमारी और आपकी कामयाबी होगी। मेरे पिता नहीं रहे। माता भी नहीं हैं। रिश्ते में बड़े भाई और भाभी हैं। इनकी तुलना माता-पिता से की जाए तो अनुचित नहीं होगा। इनका भी जन्मदिन आता है। शादी की वर्षगांठ आती है। सारे लोग उन्हें उपहार देते हैं। उनके इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं किन्तु मैं ऐसा नहीं कर पाता। नहीं कर पाने का कारण आर्थिक अभाव नहीं है बल्कि नहीं कर पाने का कारण मेरी सोच है। मैं सोचता हूं कि ईश्वर मुझे खूब कामयाब बनाये। आर्थिक रूप से मैं मालामाल हो सकूं लेकिन इतना धन और सामथ्र्य मुझे कभी मत दे कि मैं उन्हें (बड़े भाई और भाभी) को कोई उपहार देने की स्थिति में रहूं। जो लोग पूरी उम्र मुझे देते रहे हैं, उन्हें मैं भला क्या कोई सांसारिक उपहार दे सकता हूं? क्या ऐसा कोई उपहार देकर मैं उनका उपहास नहीं कर रहा हूं? यह सवाल मैं अपने आपसे पूछ रहा हूं और उन लोगों से भी जो अपने को अपने माता-पिता से ज्यादा सक्षम समझने की भूल करते हैं क्योंकि वे आज किसी ऊंचे ओहदे पर हैं और सेलरी लाखों में है। बस आखिर में मैं यह कहूंगा कि बाजारी फादर्स डे को सेलिब्रेट करने के बजाय वृद्वाश्रम में पड़े अपने वृद्व पिता को घर ले आएं। उन्हें अपने हाथों से दवा दें, रोटी दें। यकिन मानिये आपको एक दिन फादर्स डे मनाने की जरूरत नहीं होगा बल्कि आपके लिये हर दिन फादर्स डे होगा। कुछ सवालों को लेकर मैं आज आपके साथ शेयर कर रहा हूं। अपनी प्रतिक्रिया से जरूर अवगत कराएंगे।

REPORTER: bhasha

REPORTER: bhasha
savednao ke pankh

bhasha

हिन्दी से दूर होते हिन्दी के अखबार
मनोज कुमार
शीर्षक पढ़कर आप चैंक गए होंगे। चैंकिये नहीं, यह हकीकत है। मैं भी तब चैंका था जब लगभग एक दर्जन समाचार पत्रों का लगभग छह महीने तक अध्ययन करता रहा। हिन्दी अखबारों की हिन्दी का मटियामेट इन छह महीनों में नहीं हुआ बल्कि इसकी शुरूआत तो लगभग डेढ़ दशक पहले ही शुरू हो गयी थी। जिस तरह एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिये हिन्दी पाठशाला में पढ़ने वाला बच्चा हर तरह से कमजोर होता है और पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा चाहे कितना ही कमजोर क्यों न हो, वह कुशाग्र बुद्धि का ही कहलायेगा, ऐसी मान्यता है, सच्चाई नहीं। लगभग यही स्थिति हिन्दी के अखबारों का है। यह सच है कि हिन्दी के अखबारों का अपना प्रभाव है। उनकी अपनी ताकत है और यही नहीं हिन्दी के अखबार ही समाज के मार्गदर्शक भी रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम की बात करें अथवा नये भारत के गढ़ने की, हिन्दी के अखबारोें की भूमिका ही महत्वपूर्ण रही है। भारत गांवों का देश कहलाता है और हिन्दी के अखबार इनकी आवाज बने हुए हैं। बदलते समय में भी हिन्दी के अखबार प्रभावशाली बने हुए है। बाजार की सबसे बड़ी ताकत भी हिन्दी के अखबार हैं और बाजार की सबसे बड़ी कमजोरी भी हिन्दी के अखबार हैं। इन सबके बावजूद हिन्दी के अखबार कहीं न कहीं अपने आपको कमजोर महसूस करते हैं और अंग्रेजी से नकलीपन करने से बाज नहीं आते हैं। ये नकलीपन कैसा है और इसके पीछे क्या तर्क दिये जा रहे हैं, इस मानसिकता को समझना होगा। इस बात को समझने के लिये हमें अस्सी के दौर में जाना होगा। यह वह दौर था जब हिन्दी का अर्थ हिन्दी ही हुआ करता था। खबरों में अंग्रेजी के शब्दों के उपयोग की मनाही थी। पढ़ने वाले भी सुधि पाठक हुआ करते थे। समय बदला और चीजें बदलने लगीं। सबसे पहले कचहरी अथवा अदालत के स्थान पर कोर्ट का उपयोग किया जाने लगा। इसके बाद जिलाध्यक्ष एवं जिलाधीश के स्थान पर कलेक्टर और आयुक्त के स्थान पर कमिश्नर लिखा जाने लगा। हिन्दी के पाठक इस बात को पचा नहीं पाये और विरोध होने लगा तब बताया गया कि समय बदलने के साथ साथ अब हिन्दी अंग्रेजी का मिलाप होने लगा है और वही शब्द अंग्रेजी के उपयोग में आएंगे जो बोलचाल के होंगे। तर्क यह था एक रिक्शावाला कोर्ट तो समझ जाता है किन्तु कचहरी अथवा अदालत उसके समझ से परे है। जिलाध्यक्ष शब्द को लेकर यह तर्क दिया गया कि विभिन्न राजनीतिक दलों के जिलों के अध्यक्षों को जिलाध्यक्ष कहा जाता है और जिलाधीश अथवा जिलाध्यक्ष मे भ्रम होता है इसलिये कलेक्टर लिखा जाएगा ताकि यह बात साफ रहे कि कलेक्टर अर्थात जिलाध्यक्ष है जो एक शासकीय अधिकारी है न कि किसी पार्टी का जिलाध्यक्ष। आयुक्त को कमिश्नर लिखे जाने पर कोई पक्का तर्क नहीं मिल पाया तो कहा गया कि रेलपांत का हिन्दी लौहपथ गामिनी है और सिगरेट को श्वेत धूम्रपान दंडिका कहा जाता है जो कि आम बोलचाल में लिखना संभव नहीं है। इसी के साथ शुरू हुआ हिन्दी में अंग्रेजी का घालमेल। इसके बाद हिन्दी अखबारों को लगने लगा कि हिन्दी पत्रकारिता में खोजी पुट नहीं है और अनुवाद की परम्परा चल पड़ी। बड़े अंंग्रेजी अखबारों से हिन्दी में खबरें अनुवाद कर प्रकाशित की जाने लगी। इसके पीछे बड़ी, गंभीर, खोजी और न जाने ऐसे कितने तर्क देकर एक बार फिर अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं का गुणगान किया जाने लगा। 90 के आते आते तो लगभग हर अखबार यह करने लगा था। खासतौर पर क्षेत्रीय हिन्दी अखबार। मुझे लगता है कि इसके पीछे यह भावना भी काम कर रही थी कि देखिये हमारे पास श्रेष्ठ अनुवादक हैं जो अंग्रेजी की खबरों का अनुवाद कर आप तक पहुंचा रहे हैं। हालांकि यह दौर अनुवाद का दौर था किन्तु इसकी विशेषता यह थी कि इसमें अंग्रेजी का शब्दानुवाद नहीं किया जाता था बल्कि भावानुवाद किया जाता था। इससे अंग्रेजी में लिखी गयी खबर की आत्मा भी नहीं मरती थी और हिन्दीभाषी पाठकों को खबर का स्वाद भी मिल जाता था। ऐसा भी नहीं है कि इसका फायदा हिन्दी के पाठकांें को नहीं हुआ। फायदा हुआ किन्तु श्रेष्ठिवर्ग साबित हुआ अंग्रेजी जानने वाले और अंग्रेजी के अखबार विद्वान। अनचाहे में हिन्दी अखबार स्वयं को दूसरे दर्जे का मानने लगे और हिन्दी में काम करने वाले पत्रकार स्वयं में हीनभावना के शिकार होने लगे। प्रबंधन भी उन पत्रकारों को विशेष तवज्जो देने लगा जो अंग्रेजी के प्रति मोह रखते थे और एक तरह से स्वयं को अंग्रेजीपरस्त बताने में माहिर थे। हिन्दी और अंग्रेजी की यह कशमकश चल ही रही थी कि हिन्दी को लेकर आंदोलन होने लगा। अंग्रेजी हटाओ के समर्थकोंं की इस मायने में मैं पराजय देखता हूं कि वे अंग्रेजी तो हटा नहीं पाये किन्तु हिन्दी को भी नहीं बचा पाये। पत्रकारिता का यह बदलाव का युग था। सन् 77 के आपातकाल के बाद एकाएक नवीन समाचार पत्रों के प्रकाशन संख्या में वृद्वि होने लगी जिसमें हिन्दी की संख्या अधिक थी। यह स्वाभाविक भी था क्यांेकि देश भर में हिन्दीभाषियों की संख्या अधिक थी, खासकर अविभाजित मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में। मध्यप्रदेश में तब अंग्रेजी जानने वाले राजधानी भोपाल के भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स में काम करने आये अहिन्दी भाषी लोग या वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य के भिलाई इस्पात संयंत्र अथवा एसीसीएल, बाल्को आदि में काम करने वाले अहिन्दी भाषी लोगों को ही अंग्रेजी अखबार की दरकार थी। इनके लिये राजधानी दिल्ली से प्रकाशित अंग्रेजी के अखबार जो उस समय दूसरे दिन पहुंचते थे, पर्याप्त था। हिन्दी अखबारों के प्रकाशनों की बढ़ती संख्या और अनुवाद की कमी से जूझते अखबारों के संकट को समाचार एजेंसियों ने परख लिया। संभवतः सबसे पहले यूनाइटेड न्यूज एजेंसी ने वार्ता के नाम से हिन्दी समाचार देना शुरू किया। इसके बाद प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया ने भाषा नाम से हिन्दी में समाचार देना आरंभ किया। वार्ता और भाषा के आगमन के साथ हिन्दी अखबारों में अनुवादकों को नजरअंदाज किया जाने लगा। कई अखबारों ने तत्काल अनुवादकों के पद को समाप्त कर दिया। हिन्दी के अखबारों में हिन्दी की उपेक्षा का परिणाम यह रहा कि एक समय पू्रफरीडिंग के लिये हिन्दी में एमए पास लोगों को रखा जाता था। हिन्दी अखबारों को यह पद भी भारी पड़ने लगा और उपसम्पादकों और रिपोर्टरों को कह दिया गया कि अपनी खबरों का पू्रफ वे ही पढ़ेंगे। थोड़ा बहुत विरोध होने के बाद पू्रफरीडर का पद समाप्त कर दिया गया। मेरा खयाल है कि आज के समय में हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं के अलावा थोड़े से अखबारों में ही यह पद सुरक्षित है। अगर मेरी स्मरणशक्ति काम कर रही है तो पू्रफरीडर को बछावत वेतन आयोग ने श्रमजीवी पत्रकार के समकक्ष माना था। खैर, इसके बाद आज समाचार पत्रों में जो गलतियां छप रही हैं, वे हमें शर्मसार करती हैं, गर्व का भाव कहीं नहंीं है। लिखते समय वाक्य के गठन में गलती हो जाना या कई बार एक जैसे नाम में भूल की आशंका बनी रहती थी जिसे पू्रफरीडर सुधार लिया करते थे किन्तु अब हमारी गलती कौन बताये। इतना जरूर है कि अगले दिन आपकी गलती के लिये संपादक दंड देने के लिये जरूर हाजिर रहेगा। 90 में टेलीविजन संस्कृति ने तो हिन्दी समाचार पत्रों को प्रिंटमीडिया का टेलीविजन बना दिया। अब खबरों की प्रस्तुति उसी रूप में होने लगी और भाषा भी लगभग टेलीविजन की हो गई। खबर और विचार की भाषा के बीच के अंतर को भी नहीं रखा गया। वाक्य विन्यास का बिगड़ा रूप् अपने आपमें हिन्दी पाठको को डरा देने वाला है। एक बार फिर दोहराना चाहूंगा कि जिन अखबारों से बच्चे हिज्जा कर हिन्दी पढ़ना और लिखना सीखते थे, आज वह अखबार गुम हो गया है। सिटी, मेट्रो, नेशनल, इंटरनेशल जैसे शब्द धड़ल्ले से हिन्दी अखबारों में उपयोग हो रहे हैं। अखबार के एकाधिक पृष्ठों के नाम अंग्रेजी में होते हैं। कहा जाने लगा कि यह हिंग्लिश का दौर है। हिंग्लिस से एक कदम और आगे जाकर एक अखबार आईनेक्स्ट के नाम पर आरंभ हुआ। इसे न तो आप हिन्दी कह सकते हैं और न इसे अंग्रेजी, हिंग्लिश का भी कोई चेहरा नजर नहीं आया। इस बहुमुखी प्रतिभा वाले समाचार पत्र से मेरा परिचय महात्मा गांधी अन्र्तराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने कराया। पत्रकारिता के छात्रों के बीच जब मैं व्याख्यान देने पहुंचा और पत्रकारिता की भाषा पर चर्चा हुई तो विद्यार्थियों ने इस अनोखे अखबार के बारे में न केवल बताया बल्कि एक प्रति भेंट भी की। वे पत्रकारिता की इस भाषा से दुखी थे। एक तरफ हिन्दी के अखबार स्वयं को हिन्दी से दूर कर रहे थे और दूसरी तरफ अंग्रेजी के अखबार और पत्रिकायें हिन्दी पाठकों के बीच एक बड़ा बाजार देख रही थी। इन प्रकाशनों ने न केवल हिन्दीभाषी पाठकों में बाजार ढूंढ़ा बल्कि भाषाई पाठकों में वे बाजार की तलाश करने निकल पड़े। अंग्रेजी का इंडिया टुडे हिन्दी में प्रयोग करने वाला पहला अखबार था। आरंभिक दिनों में हिन्दी इंडिया टुडे की सामग्री अंग्रेजी से अनुवादित होती थी किन्तु आहिस्ता आहिस्ता हिन्दी का स्वतंत्र स्वरूप् ग्रहण कर लिया। मेरे लिये ही नहीं हिन्दी पत्रकारों के लिये यह गौरव की बात है कि हमारे अग्रज और रायपुर जैसे कभी एक छोटे से शहर (आज भले ही रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी हो) से निकले श्री जगदीश उपासने हिन्दी इंडिया टुडे के संपादकीय कक्ष के सबसे ऊंचे ओहदे पर बैठे हैं। अंग्रेजी के प्रकाशनों का हिन्दी में आरंभ होना और हिन्दी के एक पत्रकार का शीर्ष पर बैठना इस बात का संकेत है कि हिन्दी ताकतवर थी और रहेगी।हिन्दी पत्रकारिता के लिये यह सौभाग्य था कि उसे राजेन्द्र माथुर जैसे पत्रकार एवं ओजस्वी सम्पादक मिला। राजेन्द्र माथुर मूलतः अंग्रेजी के जानकार थे और वे चाहते तो उस दौर में भी बड़ी मोटी तनख्वाह पर किसी अंग्रेजी अखबार के शीर्षस्थ पर पर काबिज हो सकते थे किन्तु उन्होंने इसके उलट किया। वे हिन्दी पत्रकारिता में आये और हिन्दी में सम्पादक के होने को नया अर्थ दिया। हिन्दी पत्रकारिता में राजेन्द्र माथुर का नाम गर्व से लिया जाता रहेगा। हिन्दी पत्रकारिता को हताशा और कुंठा के दौर से बाहर आने की जरूरत है और अपने भीतर की ताकत को पहचानने की भी। हिन्दी पत्रकारिता में अनेक नामचीन पत्रकार और सम्पादक हुए जिनकी पृष्ठभूमि ग्रामीण और मध्यमवर्गीय परिवार की रही है किन्तु मेरी जानकारी में अंग्रेजी के अपवाद स्वरूप् कुछ नाम छोड़ दें तो बाकि बचे पत्रकार और सम्पादक सम्पन्न, शहरी परिवेश में पले-बढ़े और पब्लिक स्कूलांे में शिक्षित परिवारों से आये। हिन्दी पत्रकारिता और समाचार पत्रों को इस बात की मीमांसा करना चाहिए कि जब एक अंग्रेजी का अखबार हिन्दी मंे छपने के लिये मजबूर हो सकता है तो हम हिन्दी में ही अपना एकछत्र राज्य क्यों नहीं बना पाये? क्यों हम अंग्रेजी पत्रकारिता का अनुगामी बने हुए हैं? क्यों हमें अंग्रेजी पत्रकारिता श्रेष्ठ लगती है? इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हिन्दी का एक बड़ा पाठक वर्ग आज भी अंग्रेजीमिश्रित हिन्दी के खिलाफ हैं। कार्पोरेटस्वरूप लेकर तेजी से फैलते भास्कर पत्र समूह एवं कुछ हिन्दी के कुछ अन्य समाचार पत्र सम्मानजनक मानदेय देने लगे हैं। पेजथ्री पढ़ाने वाले हिन्दी के अखबारों में स्थानीय लेखकों को स्थान नहीं मिल पाता है और न ही उन्हें सम्मानपूर्वक मानदेय दिया जाता है। पाठक वर्ग भी इन दिनों अखबारों को गंभीरता से नहीं ले रहा है। वह भी अखबारों के उपहार योजनाओं में उलझ कर रह गया है। एक समय था जब गलत खबर छपने पर पाठकों की दनादन चिठिठयां समाचार पत्रों के कार्यालयों में आ जाती थी। संपादक को गलती के लिये माफी मांगने के लिये मजबूर होना पड़ता था किन्तु इन गलतियों पर पाठक ध्यान खींचने के बजाय, उसे सुधारने के बजाय मजा लेते हैं। पाठकों की यह निराशा इस बात को साबित करती है कि उसने अखबारों को गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।80 के दशक में जब मैंने देशबन्धु से अपनी पत्रकारिता का श्रीगणेश किया तो हमें प्रशिक्षण के दौरान यह बात बतायी गयी थी कि हमारे अखबार का पाठक वर्ग कौन सा है और उनमें साक्षरता का प्रतिशत क्या है। यह इसलिये कि हम खबरों की, विचारों की, संयोजन करने की कला उनकी समझ के अनुरूप् कर सकें। गंभीर गहन साहित्यिक शब्दों का जाल उन्हें अखबार से दूर कर देगा। इसका यह अर्थ भी कदापि नहीं था कि आप स्तरहीन शब्दों का उपयोग करें बल्कि समझाइश यह थी कि गृह के बजाय घर लिखें और कृषक के बजाय किसान। जनसत्ता को पढ़ते हुए मैं इस बात से गर्व से भर जाता हूं कि आज भी यह अखबार हिन्दी पाठक का अखबार है। उसकी भाषा, उसकी प्रस्तुति एक आम हिन्दुस्तानी पाठक की है जो गंगा जमुनी संस्कृति में पला बढ़ा है। जिसे हिन्दी के साथ उर्दू का भी ज्ञान है और देशज बोली की सुगंध इस अखबार में छपे हर शब्द से आपको हमको मिल जाएगी। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं उस दिन की जब हिन्दी के अखबार पेजथ्री से उबरकर वापस चैपाल का अखबार बन सकेंगे। (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं मीडिया अध्येता हैं। वर्ष 1981 में पत्रकारिता का आरंभ देशबन्धु से जहां वर्ष 1994 तक बने रहे। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समवेत शिखर मंे सहायक संपादक 1996 तक। इसके बाद स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य। वर्ष 2005-06 में मध्यप्रदेश शासन के वन्या प्रकाशन, भोपाल में बच्चों की मासिक पत्रिका समझ झरोखा में मानसेवी संपादक, यहीं देश के पहले जनजातीय समुदाय पर एकाग्र पाक्षिक आलेख सेवा वन्या संदर्भ का संयोजन। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रकारिता विवि वर्धा के साथ ही अनेक स्थानों पर अतिथि व्याख्यान। पत्रकारिता में साक्षात्कार विधा पर साक्षात्कार शीर्षक से पहली किताब मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में पहला संस्करण एवं 2006 में द्वितीय संस्करण। माखनलाल पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से हिन्दी पत्रकारिता शोध परियोजना के अन्तर्गत फेलोशिप और बाद मेे पुस्तकाकार में प्रकाशन। फिलवक्त भोपाल से मीडिया पर एकाग्र मासिक पत्रिका समागम के प्रकाशक एवं संपादक )

aagrash

प्रिय साथियों,

कतिपय तकनीकी गड़बड़ियों के चलते मेरा ब्लॉग एमपी रिपोर्टर की सामग्री दिख नहीं रही है। ऐसे में एक नया ब्लॉग बनाकर आप लोगों के साथ बातचीत करने के लिये प्रस्तुत हूं। हिन्दी पत्रकारिता को लेकर मैं कुछ पहल करने का प्रयास कर रहा हूं। आशा ही नहीं विश्वास है कि जिस तरह पहले आप लोगों ने मेरे विचारों, लेखों पर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है, वह सिलसिला बना रहेगा। सादर।
मनोज कुमार