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Saturday, June 19, 2010

father's day

फादर्स डे और वृद्वाश्रम
मनोज कुमार

आज अंग्रेजी का फादर्स डे है। हिन्दी में इसे क्या कहेंगे, मुझे नहीं मालूम। हिन्दी में यदि इसे पिता का दिन कहा गया तो इसका अर्थ ही बदल जाएगा। हिन्दी में पिता का दिन अर्थात दिवंगत पिता के लिये श्राद्ध के समय जो दिन तय होता है, उसे कहते हैं किन्तु अंग्रेजी में इसका अर्थ एकदम भिन्न है। अंग्रेजी का हर शब्द बाजार से जुड़ा होता है। पिता ही क्यों, माता, भाई, बहिन और ऐसे अनेक रिश्तों को लेकर अलग अलग दिन बना दिये गये हैं। पूरी दुनिया इस तय दिन पर जश्न मनाती है किन्तु क्या कभी किसी ने सवाल किया कि आखिर इन दिनों की निश्चितता के पीछे तथ्य और तर्क क्या है? संभव है मेरे जैसे कुछ अज्ञानी ऐसे सवाल कर रहे होंगे और उन्हें भी मेरी तरह खारिज कर दिया जाएगा क्योंकि यह सवाल उन्हें चुभते नहीं हैं, उनके सामान्य ज्ञान पर भी अंगुली नहीं उठाते हैं बल्कि ऐसे सवाल करने वाले बाजार को प्रभावित करते हैं। फार्दस डे के इस बाजारीदिवस पर कुछ अनुभव बांटना चाहता हूं, शायद यह कुछ सोचने के लिये आपको मजबूर करे। यह कितनी शर्मनाक बात है कि फादर्स डे मनाने में हम बेहिसाब खर्च कर देते हैं किन्तु बूढ़े बाप को घर से निकालने में एक मिनट से ज्यादा खर्च नहीं करते हैं। उन्हें वृद्वाश्रम में भेजकर हम अपने आपको मुक्त कर लेेते हैं। जिन बेटों ने अपने पिता को वृद्वाश्रम भेजा है, क्या वे आज फादर्स डे पर आत्ममंथन करेंगे।
आज फादर्स डे है। पिता के लिये महंगे उपहार खरीदे जाएंगे किन्तु जेब तो पिता की ही कटेगी। पिता का खुश होना, खुश होना न होकर मजबूरी होगी क्योंकि उनके दुखी होने से बच्चों के चेहरे मुरझा जाएंगे। एक पिता की खुशी अपने बच्चे के चेहरे पर मुस्कराहट देख कर होती है। अब एक सवाल उन बच्चों से जो आज अपने अपने पिता के लिये फादर्स डे सेलिब्रेट करने जा रहे हैं, क्या उन्हें अपने दादाजी का नाम मालूम है? क्या उन्हें अपनी दादी का नाम मालूम है? क्या उन्हें पता है कि उनके पड़दादा या पड़दादी का नाम क्या था? क्या वे परिवार के उन बुर्जुगों का नाम भी जानते हैं, जो उनके पितातुल्य हैं? शायद कुछ लोग जानते हांेंगे और मेरा विश्वास है कि अधिकांश का जवाब ना में होगा। जो बच्चा अपने परिवार के बारे में नहीं जानता है, जो बच्चा अपने पिता के जनक को नहीं जानता है, उसके बच्चे उनके लिये तो सेलिब्रेट कर रहे होंगे लेकिन उनके बच्चे क्या आपके लिये सेलिब्रेट करेंगे? जिन्हें अपने दादा का नाम नहीे मालूम, उनके बच्चे क्या करेंगे अपने दादा का नाम जानकर। बाजार भी यही कहता है कि आज और बल्कि अभी को जानो, खरीदो, खाओ और मौज करो।
फादर्स डे के लिये मीडिया की भी विशेष तैयारी होती है। आखिर इनमें उनका भी आर्थिक हित जुड़ा है। कंपनियां अपने अपने प्रोडक्ट का विज्ञापन देंगी और मीडिया फादर के प्रति लव जाहिर करने के लिये अलग अलग किस्म के विज्ञापन जारी करेगी। यही नहीं, अपने फादर के लिये अच्छे मैसेज देने वाले को पुरस्कार भी देगी। मोबाइल फोन या इसी तरह की चीज, भले ही इसके लिये वह ऐसे अनेक बच्चों से लाखों रूप्ये टुकड़ों में वसूल ले। लगभग एक सप्ताह से फादर्स डे पर विशेष सामग्री देने का ऐलान अखबार और पत्रिका कर रहे हैं। टेलीविजन भी फादर की ब्रांडिंग में लग गयी है क्योंकि फादर पिता नहीं, ब्रांंड है जिसकी डिमांड साल में एक दिन होती है। अच्छा लगता है कि जिन माता पिता को हम साल के तीन सौ पैंसठ दिन स्मरण करते हैं। सुबह सवेरे उनका आशीर्वाद प्राप्त कर जीवन में सफलता की कामना करते हैं और मन में कहीं यह रहता है कि हम भी अपने पिता की तरह बन सकें। अब हम बाजार में खड़े हैं। बाजार में मां भी है और पिता भी। उनका आशीर्वाद भी नेट और मोबाइल से मिल रहा है। स्वाभाविक है कि समय नया है तो आशीर्वाद देने का तरीका भी नया ही होगा। बढ़ती आपाधापी और वक्त की कमी ने इसे मान लिया है। यह बहुत ज्यादा असहज नहीं करता है।
बदलाव की इस बयार में बह रहे समाज को रोकना तो मुश्किल काम है। स्वयं को रोक सकें, यही हमारी और आपकी कामयाबी होगी। मेरे पिता नहीं रहे। माता भी नहीं हैं। रिश्ते में बड़े भाई और भाभी हैं। इनकी तुलना माता-पिता से की जाए तो अनुचित नहीं होगा। इनका भी जन्मदिन आता है। शादी की वर्षगांठ आती है। सारे लोग उन्हें उपहार देते हैं। उनके इस दिन को सेलिब्रेट करते हैं किन्तु मैं ऐसा नहीं कर पाता। नहीं कर पाने का कारण आर्थिक अभाव नहीं है बल्कि नहीं कर पाने का कारण मेरी सोच है। मैं सोचता हूं कि ईश्वर मुझे खूब कामयाब बनाये। आर्थिक रूप से मैं मालामाल हो सकूं लेकिन इतना धन और सामथ्र्य मुझे कभी मत दे कि मैं उन्हें (बड़े भाई और भाभी) को कोई उपहार देने की स्थिति में रहूं। जो लोग पूरी उम्र मुझे देते रहे हैं, उन्हें मैं भला क्या कोई सांसारिक उपहार दे सकता हूं? क्या ऐसा कोई उपहार देकर मैं उनका उपहास नहीं कर रहा हूं? यह सवाल मैं अपने आपसे पूछ रहा हूं और उन लोगों से भी जो अपने को अपने माता-पिता से ज्यादा सक्षम समझने की भूल करते हैं क्योंकि वे आज किसी ऊंचे ओहदे पर हैं और सेलरी लाखों में है। बस आखिर में मैं यह कहूंगा कि बाजारी फादर्स डे को सेलिब्रेट करने के बजाय वृद्वाश्रम में पड़े अपने वृद्व पिता को घर ले आएं। उन्हें अपने हाथों से दवा दें, रोटी दें। यकिन मानिये आपको एक दिन फादर्स डे मनाने की जरूरत नहीं होगा बल्कि आपके लिये हर दिन फादर्स डे होगा। कुछ सवालों को लेकर मैं आज आपके साथ शेयर कर रहा हूं। अपनी प्रतिक्रिया से जरूर अवगत कराएंगे।

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